अंधविश्वास पर कविता "कुछ बाबाजी "


अंधविश्वास पर कविता


"कुछ बाबाजी"

भोले - भाले लोगों को 
कुछ बाबजी रोज हैं ठगते
साइन्स के एक्सपेरिमेंट दिखा
खुद को भगवान बताया करते

पर अंदर से ये बहुत मेले 
अत्याचार महिला पर करते 
बाहर से दिखावे के लिए
ब्रह्मचर्य का पालन करते 

जितना धन ना उद्द्योग्पतियों पर
खजाने इनके पास में मिलते
आश्रमों में इनके ही तो 
लाठी ,तमंचे और बंदूके मिलते

ऐसे लोग ही औरत को 
पुत्र प्राप्ति की दवाएं देते
पुरुषों में होते ये जीन्स
 अनपढ़ , गंवार कहाँ समझते

पहन कर के केसरिया चोला 
रूप नये -नये हैं धरते 
बगल में तो होता चाकू
 होंठ से राम जपा करते 

भूत-प्रेत के अस्तित्व को
ये ही हैं बढ़ावा देते
खुद जीते फाइव स्टार की जिंदगी
जनता से नेम- व्रत करवाते

ऐसे पाखंडी लोगों के 
ना बहकावे में कभी भी आना
वर्ना तन , मन और धन से
होगा इनके ही आधीन हो जाना




विश्वास पर कविता पढ़ें 
"मैं हूँ वो मन का विश्वास"







9 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/08/32.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  2. बहुत सुन्दर!!!

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  3. बहुत सुन्दर....
    समसामयिक रचना....

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  4. सब मित्रों का हार्दिक धन्यवाद |

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  5. सही एवं सटीक !

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  6. आभार मीना जी |

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  7. कलंक हैं ऐसे बाबा जो धर्म को बदनाम करते हैं ... भोले लोगों के विश्वास से खेलते हैं ...

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  8. तथाकथित बाबाऑ ने चमन किया बदनाम
    इनको मिलनी चाहिए घोर सजा औअपमान

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  9. कविता पढ़ने के लिए आभार |

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